गुरूवार, अक्टूबर 21, 2021
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वह भी क्या दिन थे, हमारा प्यारा बचपन

वह भी क्या दिन थे,
न खाने की चिंता, न पिने की चिंता
कहीं पर भी सो जाओ, पर आँखे हमेशा बिस्तर पर ही खुलती थी।
गलती हम करे सजा किसी ओर को दिलाते थे, जब छोटे-छोटे खिलौने में जान बसा करता थी, आज कमाने से फुरसत कहां है, रोते हुए आँसुओ में भी माँ हंसा दिया करती थी।
वह भी क्या दिन थे, हमारा प्यारा बचपन।

कमाने तो कभी जाना ही नहीं था बस गंवाना था ।
कोई भी मेहमान घर आए अपने पास पैसे ही पैसे हुआ करते थे।
कितने मासूम हुआ करते थे वो दिन चवन्नी में चाँद को खरीदने की ताकत रखा करते थे।
स्कूल से आते ही जो मजा दोस्तों के साथ खेलने में था वो आज मोबाईल वाले दोस्तों में कहा।
वह भी क्या दिन थे, हमारा प्यारा बचपन।

आँख-मिचौली का खेल, लुका-छिप्पी खेले फिर उन अँधेरी गलियों में
झूठ-बोल कर सच्चे लगते थे, कागज़ की नाव को भी पानी में चलाने की आस रखते थे ।
अपना एटीएम तो अपनी दादी हुआ करती थी पता नहीं आज वो दादी कौन से आश्रम में अपने आँसू बहा रही है, न कोई सवाल पूछे न जवाब देना होता था ।
वह भी क्या दिन थे, हमारा प्यारा बचपन।

कमलेश सोलंकी
9993563875

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