रविवार, अगस्त 1, 2021
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राम से बड़ा राम का नाम तो फिर उस पर राजनीति क्यों?

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे।

सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने॥

श्रीरामरक्षास्तोत्रं का के इस मंत्र को श्री राम तारक मंत्र भी कहा जाता है। इसका जाप सम्पूर्ण विष्णु सहस्त्रनाम या विष्णु के 1000 नामों के जाप के समतुल्य है। इस मंत्र की व्याख्या स्वयं भोलेनाथ शंकर जी ने पार्वती जी को बताई थी। राधा जी ने भी राम नाम की महिमा को बताते हुए कहा है कि ‘रा’ शब्द विश्ववाचक है और ‘म’ ईश्वरवाचक अतः जो समस्त लोकों का ईश्वर है उसे ‘राम’ कहा गया है। पौराणिक आख्यानों के इतर सार्वजनिक जीवन में गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में श्री राम के पृथ्वीलोक के जीवन को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत कर अनुकरणीय बना दिया है। महात्मा गांधी भी रामराज्य की कल्पना पर बल देते थे। राम से बड़ा राम का नाम है और यह उक्ति सर्वसमाज में प्रतिष्ठित है किन्तु राजनीति ने राम के नाम को भी कलंकित करने का षड्यंत्र किया है। आज जय श्री राम के उद्घोष को साम्प्रदायिक रंग दिया जाता है तो अयोध्या में निर्माणरत प्रभु के मंदिर की समर्पण राशि को चंदे का नाम देकर हिन्दुओं की भावनाओं से दुराचार किया जाता है। हाँ, यह मानसिक दुराचार ही तो है जो देश के बहुसंख्यकों के साथ राजनीतिक षड्यंत्र के कारण किया जाता रहा है। एक ओर इस देश का बहुसंख्यक समाज अपने आराध्य प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर की प्रतीक्षा में रत है वहीं राजनीतिक षड्यंत्र ने इसके निर्माण में भ्रष्टाचार का झूठा आरोप लगाकर इसकी पवित्रता पर संदेह उत्पन्न किया है। पूर्व में रामसेतु से राम मंदिर निर्माण; यहाँ तक कि श्री राम के अस्तित्व तक को नकारने वाले राजनीतिक दल यदि आज भी राम के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं तो इसमें कहीं न कहीं उन हिन्दुओं की भी गलती है जो धर्मनिरपेक्षता के अंधे कुएं में धकेल दिए गए हैं। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जय श्री राम के उद्घोष को ‘जेएसआर’ बोलते हैं और हमारा हिन्दू समाज ईद जैसे मुस्लिम त्यौहार पर ‘बधाइयां’ देने को लालायित रहता है। क्या यह खोखली धर्मनिरपेक्षता नहीं है? क्या यही कथित सेकुलरिज्म है? क्या इसे ही सर्वधर्म समभाव कहा जाता है? यदि उत्तर हाँ है तो मुझे धर्मांध कहलाने में प्रसन्नता होगी क्योंकि मैं अपने आराध्यों व धार्मिक प्रतीक चिन्हों से बैर रखने वालों के मजहबी-पंथी विचारों-त्योहारों को सिरे से ठुकरा दूंगा। किन्तु यहाँ बात मात्र मेरी नहीं है। क्या यही चेतना हिन्दू समाज स्वयं के भीतर जाग्रत नहीं कर सकता? कर सकता है किन्तु राजनीतिक दलों के धर्मनिरपेक्ष नामक विष ने उसकी आत्ममुग्धता को क्षीण कर दिया है या कहें कि नष्ट ही कर दिया है। वह राम के नाम पर राजनीति करने वालों के हाथों की कठपुतली बन गया है। 

अब चूँकि छह से आठ माह में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है और विपक्षी राजनीतिक दल जनता के विश्वास को खो चुके हैं तो उन्होंने पुनः राम नाम में राजनीतिक संजीवनी ढूँढने का प्रयास प्रारंभ कर दिया है। राम मंदिर निर्माण पर तो वे प्रश्न उठा ही चुके हैं और अब राम के नाम पर आतंक फ़ैलाने की शुरुआत भी कर दी गई है। गाजियाबाद के लोनी में हुई घटना को इसी परिपेक्ष्य में देखना होगा। जब मुस्लिम समाज द्वारा किसी हिन्दू को प्रताड़ित किया जाता है अथवा उसे शारीरिक चोट पहुंचाई जाती है तो उसके द्वारा कभी ऐसे तर्क नहीं दिए जाते कि मुझे इस्लाम में शामिल न होने के कारण पीटा गया बल्कि ऐसे मामले आपसी कहकर सुलझा लिए जाते हैं किन्तु जब आपसी मामलों में हिन्दुओं द्वारा किसी मुस्लिम की पिटाई होती है तो उधर से आरोप लगता है कि जय श्री राम नहीं कहने पर पिटाई की गई। गत कुछ वर्षों से इस प्रकार के झूठे आरोपों की बाढ़ सी आई हुई है और यह सब हुआ है हिन्दुत्ववादी चेतना के कारण। चूँकि धर्मनिरपेक्षता के चोंचले से दूर रहने वाले हिन्दू अब गंगा-जमुनी संस्कृति के झूठ को समझ चुके हैं। उन्हें स्पष्ट रूप से भान हो चुका है कि यह तो दंगा-जेहादी मानसिकता है जो हिन्दुओं के समूल नाश पर सांस लेती है। किन्तु जब भी उपरोक्त आरोप लगाए जाते हैं तो राजनीति दल खूनी गिद्धों की भाँति हिंदुत्व तथा श्री राम के नाम को कटघरे में खड़ा कर समाज में वैमनस्य फैलाते हैं। लोनी का मामला प्रकाश में आते ही जिस प्रकार इन राजनीतिक खूनी गिद्धों ने योगी सरकार को निशाने पर लिया और राम के नाम पर सवाल उठाये वह पूरे देश ने देखा किन्तु इस बार इस वर्ग का सामना ऐसे सन्यासी से था जिसकी राम पर आस्था प्रश्नों से परे है। उक्त मामले में कड़ी कानूनी कार्रवाई की शुरुआत ही ऐसे खूनी गिद्धों के षड्यंत्रों पर रोक लगाएगी।

यह हमारे देश में ही संभव है कि जहाँ राम का नाम राम से बड़ा हो वहां राम के नाम पर ही राजनीति की जाये। हालांकि हिन्दू समाज को अब सावधान होना चाहिए क्योंकि जैसे-जैसे चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, ऐसे मामले बहुतायत की संख्या में आयेंगे। जो योगी कानून-व्यवस्था को चाक-चौबंद कर प्रशंसनीय कार्य कर रहे थे; राम के नाम पर विवाद खड़े कर व समाज में वैमनस्य स्थापित कर उन्हें भी घेरने का प्रयास किया जाएगा। चूँकि धार्मिक विवाद से वर्ग-संघर्ष बढ़ता है अतः इस प्रकार के मामले विपक्ष को राजनीतिक लाभ पहुंचाते हैं और यह तरीका काम भी करता है तो योगी सरकार ऐसे मामलों के दोषियों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाये। इस ओछी मानसिकता से पार पाने का अभी तो यही सर्वोत्तम उपाय है।

– सिद्धार्थ शंकर गौतम

मीडिया सेल कोऑर्डिनेटर, ‘एकल’ वनबंधु परिषद

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