रविवार, अगस्त 1, 2021
होमलेखबढ़ती जनसंख्या : लगाम ही समाधान

बढ़ती जनसंख्या : लगाम ही समाधान

क्या बढ़ती मुस्लिम जनसँख्या देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक ताने-बाने के लिए चिंता का सबब बनती जा रही है? जी हाँ, यह सत्य है कि बढ़ती जनसँख्या में मुस्लिमों में व्याप्त सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक तथा धार्मिक कट्टरता के कारण असमानता उत्पन्न हो रही है। हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने राज्य में गरीबी कम करने के उद्देश्य से जनसँख्या नियंत्रण के लिए मुस्लिमों से उचित परिवार नियोजन नीति अपनाने का अनुरोध किया। हालांकि उनके इस अनुरोध ने विपक्ष सहित मुस्लिम समाज के ठेकेदारों को उद्वेलित कर दिया किन्तु सत्य को प्रमाण की क्या आवश्यकता? यह सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद से ही मुस्लिमों में प्रजनन दर बढ़ती ही जा रही है। यदि असम की ही बात करें तो 1991 से 2001 के एक दशक में ही असम में हिंदू जनसंख्या वृद्धि दर 14.9 प्रतिशत के मुकाबले मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 29.3 प्रतिशत हो गई जबकि वर्ष 2001 से 2011 तक के दशक में हिंदू जनसंख्या वृद्धि दर 10.9 प्रतिशत के मुकाबले मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 29.6 प्रतिशत हो गई। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार असम में मुस्लिम जनसँख्या वृद्धि दर पूरे देश में सबसे अधिक है। वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अनुसार असम की 3.12 करोड़ जनसँख्या में 34.22 प्रतिशत मुस्लिम हैं और इस कारण असम के कई जिलों में मुस्लिम बहुसंख्यक हो गए हैं। इसके उलट सिख, बौद्ध, जैन व अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की जनसँख्या का प्रतिशत एक प्रतिशत से भी कम है जबकि राज्य में ईसाई 3.74 प्रतिशत हैं। सन् 1971 में असम की कुल जनसँख्या में 72.51 प्रतिशत आबादी हिंदू थी वहीं मुस्लिम आबादी 24.56 प्रतिशत थी किन्तु वर्ष 2011 में असम में हिंदू आबादी 61.46 प्रतिशत रह गई। इससे स्पष्ट है कि असम में मुस्लिम जनसँख्या में असामान्य बढ़ोत्तरी होने से वहां की भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संस्कृति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

6 वर्ष पूर्व केन्द्र सरकार ने 2011 की जनगणना के धर्म आधारित आंकड़े जारी किये थे जिसके अनुसार 2001 से 2011 के बीच देश की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 0.8 प्रतिशत बढ़ी है जबकि हिंदुओं की हिस्सेदारी 0.7 प्रतिशत घटी है। केंद्र शासित लक्षद्वीप में 96 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है जबकि जम्मू और कश्मीर में 85 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। पश्‍चिम बंगाल की बात करें तो राज्य में 2001 में मुस्लिम आबादी 25 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्‍चिम बंगाल में हिन्दुओं की आबादी में 1.94 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई जबकि राज्य में मुसलमानों की आबादी 1.77 प्रतिशत की दर से बढ़ी है जो राष्ट्रीय स्तर से भी कहीं दोगुनी दर है। 1951 की जनगणना में पश्‍चिम बंगाल की कुल जनसंख्या 2.63 करोड़ में मुसलमानों की आबादी लगभग 50 लाख थी जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 2.50 बात करें करोड़ हो गई। राज्य में 2011 में हिन्दुओं की 10.8 प्रतिशत दशकीय वृद्धि दर की तुलना में मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर दोगुनी यानी 21.8 प्रतिशत है। केरल की बात करें तो वर्तमान में केरल की कुल 3.50 करोड़ आबादी का 54.7 प्रतिशत ही हिन्दू हैं जबकि 26.6 प्रतिशत मुस्लिम और 18.4 प्रतिशत ईसाई हैं। 2011 की जगनणना के धार्मिक आंकड़ों के अनुसार केरल में हिन्दुओं की आबादी 16.76 प्रतिशत की दर से तो मुस्लिमों की आबादी 24.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। पहली बार राज्य में हिन्दुओं की जनसँख्या 80 प्रतिशत से नीचे आई। राज्य में 2001 में हिन्दू 80.5 प्रतिशत थे जो घटकर 79.8 प्रतिशत रह गए जबकि मुस्लिमों की जनसँख्या 13.4 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गई। केरल में मुस्लिमों की बढ़ती जनसँख्या के साथ ही ईसाई भी अपनी आबादी बढ़ाने में लगे हुए हैं। 18.4 प्रतिशत ईसाई वहां के जनसँख्या संतुलन को असामान्य कर चुके हैं। हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवाकर भी मिशनरी और मुस्लिम अपनी जनसँख्या बढ़ा रहे हैं। बात देश के सबसे बड़े सूबे की करें तो उत्तर प्रदेश साल में 2001 की जनगणना के अनुसार 80.61 प्रतिशत हिंदू और 18.50 फीसदी मुसलमान थे किन्तु 2011 में हिंदुओं की आबादी का प्रतिशत घटकर 79.73 रह गया और मुस्लिमों की आबादी बढ़कर 19.26 प्रतिशत हो गई। यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश के 70 में से 57 जिलों में हिंदुओं की आबादी मुस्लिमों के मुकाबले घट रही है।

2017 में अमेरिका के एक थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर ने अपनी रिपोर्ट में प्रकाशित किया था कि वर्ष 2070 तक दुनिया में सबसे अधिक आबादी मुस्लिमों की होगी। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 से 2050 के बीच मुस्लिमों की आबादी 73 प्रतिशत तक बढ़ेगी जबकि ईसाई आबादी 35 प्रतिशत बढ़ जायेगी। प्यू रिसर्च सेंटर ने जोर देते हुए कहा था कि 2050 तक भारत में विश्व के सबसे अधिक मुस्लिम होंगे और भारत में इनकी आबादी 30 करोड़ के पार हो जाएगी। वर्तमान में इंडोनेशिया सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है किन्तु भारत उसे पीछे छोड़ने की राह पर चल चुका है। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस जनसँख्या विस्फोट पर लगाम लगाने की आवश्यकता नहीं है? यदि मुस्लिम समुदाय संगठित रूप से अपनी जनसँख्या को बढ़ा रहा है तो क्या इसे देश के लिए खतरा नहीं माना जाए? दरअसल, मुस्लिमों में प्रचलित बहु-विवाह की प्रथा व धर्मान्तरण ही उनकी जनसँख्या को बढ़ाने के मुख्य कारक हैं। ऐसा नहीं है कि मुस्लिम महिलाओं में प्रजनन दर बढ़ी हो किन्तु जिस अनुपात में मुस्लिम जनसँख्या बढ़ रही है वह प्रजनन दर से अभी भी काफी अधिक है। एक वर्ग की जनसँख्या वृद्धि विभिन्न क्षेत्रों में असमानता लाती है जिसके परिणामस्वरूप बहुसंख्यक वर्ग स्वयं को छला हुआ महसूस करता है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग के अनुसार भारत की जनसँख्या 2030 तक 1.5 बिलियन और 2050 में 1.64 बिलियन तक पहुंच जाएगी जबकि 2030 तक चीन की जनसँख्या 1.46 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। इसका अर्थ यह है कि हम जनसँख्या के मामले में चीन को पछाड़ते हुए शीर्ष पर काबिज होने वाले हैं। वर्तमान में दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी भारत में वैश्विक सतह क्षेत्र के केवल 2.45 प्रतिशत और जल संसाधनों के 4 प्रतिशत हिस्से के साथ निवास करती है। इसी बढ़ती जनसँख्या को रोकना हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है किन्तु मुस्लिम समाज अपनी धार्मिक संकीर्णता के कारण इस ओर न तो ध्यान ही देता है और न ही इसे रोकने हेतु उपाय करता है। ‘बच्चे तो अल्लाह की देन हैं’ की सोच ने मुस्लिम समाज की मानसिकता को कुंद कर दिया है। हालांकि पढ़े-लिखे मुस्लिमों में अब बच्चों की संख्या को लेकर सोच में सकारात्मक अंतर आया है किन्तु यह प्रतिशत अभी बहुत कम है। इसमें अभी बहुत सुधार की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए जनसंख्या नियंत्रण की बात की थी। उन्होंने कहा था कि जो छोटा परिवार रख रहे हैं वह भी एक प्रकार से देशभक्ति कर रहे हैं। उन्होंने परिवार को दो बच्चों तक सीमित रखने की अपील की थी। उनकी इस अपील से जनसँख्या नियंत्रण पर बहस छिड़ी थी किन्तु बाद में इस पर विराम लग गया। अब असम के बाद उत्तर प्रदेश में जनसँख्या नियंत्रण कानून को लेकर कवायद शुरू होती दिख रही है। राज्य सरकारों के इस कदम की विपक्ष आलोचना कर रहा है किन्तु व्यापक देश हित में उनका यह कदम राष्ट्रभक्ति की श्रेणी में माना जाएगा। 1976 में संविधान के 42वें संशोधन के तहत सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची में जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन जोड़ा गया था जिसके तहत केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है। इस हिसाब से जो राज्य सरकारें जनसँख्या नियंत्रण पर कानून बनाने का मन बना रही हैं वे संवैधानिक दायरे में रहकर ही कार्य कर रही हैं। यदि विपक्ष इस पर ऊँगली उठा रहा है तो यह मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति ही है। इस समय देश को एक मजबूत जनसँख्या नियंत्रण कानून की आवश्यकता है क्योंकि पूर्व का अनुभव कहता है कि हमारे देश में स्व-नियंत्रण से कुछ हासिल नहीं होता। हाँ, कानूनी डंडे के जोर पर स्थिति में बदलाव अवश्य आ सकता है। हालांकि यह इतना सरल भी नहीं है क्योंकि सरकार के लिए परिवार के आकार को विनियमित करने के लिए एक केंद्रीय कानून बना पाना संभव नहीं है। 1994 के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में में जब भारत ने जनसंख्या और विकास की घोषणा पर हस्ताक्षर किया था तो उसमें परिवार के आकार और दो प्रसव के बीच के समय के निर्धारण के बारे में निर्णय लेने का अधिकार दंपती को दिया था। इसके इतर 2020 में सर्वोच्च न्यायलय में पेश हलफनामे में भी केंद्र सरकार ने यह कहा था कि ‘निश्चित संख्या में बच्चों को जन्म देने की किसी भी तरह की बाध्यता हानिकारक होगी और जनसांख्यिकीय विकार पैदा करेगी। देश में परिवार कल्याण कार्यक्रम स्वैच्छिक है जिसमें अपने परिवार के आकार का फैसला दंपती कर सकते हैं और अपनी इच्छानुसार परिवार नियोजन के तरीके अपना सकते हैं। इसमें किसी तरह की अनिवार्यता नहीं है।’ अतः अब यह सरकार व अन्य राज्य सरकारों को तय करना है कि वह जनसँख्या नियंत्रण पर क्या कदम उठाती हैं? फिलहाल तो असम तथा उत्तर प्रदेश से उठी आवाज की प्रशंसा की जाना चाहिये।

इन राज्यों में है आंशिक जनसँख्या नियंत्रण कानून

1. मध्य प्रदेश – 2001 में लागू कानून के तहत दो से अधिक बच्चों वाले को सरकारी नौकरियों और लोकल बॉडी इलेक्शन लड़ने से रोक थी किन्तु 2005 में इस फैसले को पलट दिया गया। अब सरकारी नौकरियों और न्यायिक सेवाओं में ही टू चाइल्ड पॉलिसी लागू है।

2. असम – 1 जनवरी, 2021 से दो से अधिक बच्चों वाले माता-पिता को सरकारी नौकरी की पात्रता नहीं होगी।

3. राजस्थान – राज्य का पंचायती ऐक्ट दो से अधिक बच्चों के उन्हीं मात-पिता को पंचायत चुनाव लड़ने की छूट देता है जिनका दो में से कोई एक बच्चा दिव्यांग हो।

4. गुजरात – लोकल अथॉरिटीज ऐक्ट में के अनुसार दो से अधिक बच्चों वाले पंचायत और नगरपालिका का चुनाव लड़ने से वंचित किये जायेंगे।

5. आंध्र प्रदेश/तेलंगाना – पंचायती राज ऐक्ट के अनुसार दो से अधिक बच्चों वाले माता-पिता पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

6. बिहार- दो से अधिक बच्चों के माता-पिता के नगरपालिका चुनाव लड़ने पर रोक।

7. उत्तराखंड – दो से अधिक बच्चों के माता-पिता के नगरपालिका चुनाव लड़ने पर रोक।

8. महाराष्ट्र – दो से अधिक बच्चों वाले ग्राम पंचायत और नगरपालिका चुनाव लड़ने की पात्रता नहीं रख सकेंगे। महाराष्ट्र सिविल सर्विसेज रूल्स, 2005 के तहत ऐसे व्यक्ति को राज्य सरकार में भी कोई पद नहीं दिए जाने का प्रावधान किया गया है।

9. ओडिशा – दो से अधिक बच्चों वाले माता-पिता को शहरी निकायों के चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं है।

जनसँख्या नियंत्रण के लिए कब-कब हुई कवायद?

1970 के दशक में संजय गाँधी द्वारा जनसँख्या नियंत्रण के लिए शुरू किये गए नसबंदी कार्यक्रम की चहुँओर हुई आलोचना के बाद से राजनेताओं ने जनसँख्या नियंत्रण पर चुप्पी साध ली थी किन्तु हाल के वर्षों में या यूँ कहें कि 2014 की नरेन्द्र मोदी सरकार के बाद से अब विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता जनसँख्या नियंत्रण की वकालत करते नजर आते हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने दिसंबर 2018 में जनसँख्या नियंत्रण को लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा था। इसके अलावा इस मुद्दे पर वे दिल्ली उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ चुके हैं। 2020 के बजट सत्र के दौरान भाजपा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने राज्यसभा में जनसंख्या विस्फोटा का मुद्दा उठाया था। राज्य सभा सांसद राकेश सिन्हा जुलाई 2019 में राज्य सभा में जनसंख्या विनियमन विधेयक को एक निजी विधेयक के रूप में पेश कर चुके हैं। जनसँख्या नियंत्रण की मांग को लेकर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, राजेंद्र अग्रवाल और स्वामी यतींद्रानंद गिरी की अगुवाई में 11 अक्टूबर, 2019 से मेरठ से दिल्ली तक पैदल यात्रा की गई। इससे पहले भी गिरिराज सिंह जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग को लेकर 2019 में जनसंख्या समाधान फाउंडेशन के बैनर तले 125 सांसदों का हस्ताक्षर युक्त पत्र राष्ट्रपति को सौंप चुके हैं। 2016 में वर्तमान संस्कृति मंत्री श्री प्रह्लाद सिंह पटेल भी जनसंख्या नियंत्रण पर एक निजी सदस्य बिल पेश कर चुके हैं। भाजपा से राज्यसभा सांसद डॉ. अनिल अग्रवाल भी अगस्त 2020 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर आगामी संसद सत्र में ही जनसंख्या नियंत्रण बिल लाने का आग्रह कर चुके हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद भी जनसँख्या नियंत्रण कानून पर जोर देते रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद से अब तक जनसँख्या नियंत्रण पर 35 बिल विभिन्न दलों के सांसद पेश कर चुके हैं जिनमें 15 बिल कांग्रेस सांसदों की ओर से पेश किए गए हैं। कई राजनेताओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से भी जनसँख्या नियंत्रण की आवश्यकता पर बल देते हुए अपनी आवाज मुखर की है। 2015 में गोरखपुर से लोकसभा सांसद और वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक ऑनलाइन पोल के माध्यम से जनसँख्या नियंत्रण पर समाज की राय मांग चुके हैं जिसमें 80 प्रतिशत से अधिक लोगों ने जनसँख्या नियंत्रण कानून पर अपनी सहमति जताई थी। कई मीडिया घराने भी ऑनलाइन सर्वे के द्वारा उक्त विषय पर जनता की राय जानते रहते हैं।

– सिद्धार्थ शंकर गौतम
मीडिया सेल समन्वयक, ‘एकल’ वनबन्धु परिषद्

साभार – पांचजन्य

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments