गुरूवार, अक्टूबर 21, 2021
होमलेखपुण्यतिथि स्मरण: राजमाता जिजाऊ माँसाहेब

पुण्यतिथि स्मरण: राजमाता जिजाऊ माँसाहेब

पुण्यतिथि स्मरण: ज्येष्ठ कृष्ण नवमी सम्वत् १७३१

हिन्दवी साम्राज्य दिनोत्सव के मात्र १२वें दिन ही स्वराज्य को लगा वज्राघात
राजमाता स्वराजयकांक्षिणी जीजा माता का महानिर्वाण

जो स्वयं के कर्त्तव्य से जीजाऊसाहेब कर्मयोगिनी कुंती और कठोर निश्चयी विदुला इनकी पंक्ति में आकर बैठ गयी।

प्राणों से बढ़कर हैं स्वराज्य की अस्मिता: राजमाता जीजाबाई

शिवाजी महाराज ने तो स्वराज्य की स्थापना सम्वत् १७३१ में दैहिक रूप से की थी परन्तु आज उस नारी की पुण्यतिथि हैं जिसने स्वराज्य की स्थापना उससे पहले ही प्रत्येक योद्धा सहित सामान्य जनमानस के हृदयों में कर दी थी

१७ वीं सदी के प्रारब्ध में सर्वत्र परतंत्रता की बेड़िया जकड़ी हुई थी। उत्तर में मुगल, बीजापुर में आदिलशाही, अहमदनगर की निजामशाही तो गोलकुंडा की कुतुबशाही; इस प्रकार चारों ओर आक्रान्ताओं के समय में सिंदखेड़ के जागीरदार लखूजी राव जाधव और महालसाबाई के यहाँ पौष शुक्ल पूर्णिमा विक्रम सम्वत् १६५९ को एक पुत्री का जन्म होता हैं। पाँच बड़े भाइयों दत्ताजी, अचलोजी, राघोजी, यशवंतराव और बहादुरजी के साथ तलवारबाजी, घुड़सवारी के साथ-साथ अपनी माँ द्वारा धार्मिक ग्रन्थों का श्रवण करते हुए बालिका जीजा का बचपन बिता।
जब वह ६ वर्ष की बालिका अपने स्वजनों पर आक्रांताओं के अत्याचार, सैकड़ों लोगों का जबरन धर्मांतरण, स्त्रियों का शील भंग होते हुए देखती हैं तो उसका मन विचलित हो जाता हैं और वह इसका उत्तर अपने पिताश्री से मांगती और उनसे समाज की रक्षा का वचन लेती हैं परन्तु लखूजीराव स्वयं निज़ामशाही में कार्यरत थे।
मात्र ८ वर्ष की आयु में जीजा का विवाह मालोजी भोंसले के पुत्र शाहजी से हो जाता हैं तो वह यही सोचती है कि मैं अपने पति द्वारा इस समाज को इन निर्दयी शासकों से स्वतंत्र कराऊँगी परन्तु दुर्भाग्यवश शाहजी आदिलशाही में सरदार थे। यहाँ भी जीजा बाई के हाथ निराशा ही लगती हैं।
जीजा के मन में यही प्रश्न बार-बार आता कि श्रद्धावान मूर्तिपूजक होते हुए भी लोग इन मूर्तिभंजक यवनों की सेवा क्यों करते है? हमारा देश कितना विशाल है, फिर भी मुट्ठी भर यवनों ने इन पर विजय कैसे पाई? हमारा स्वाभिमान क्यों नही जागता? आपस में लड़ते रहने की अपेक्षा हम एकजुट होकर इन परकियों से क्यों नहीं लड़ते? हमनें अपनी बुद्धि, विद्या, प्रतिभा, शौर्य, कला सबकुछ इन यवनों के चरणों में क्यों समर्पित कर दिया? यह राक्षसी राज्य कब समाप्त होगा? कौन समाप्त करेगा?
तब सिंहनाद होता हैं उस स्वराज्य का, जिसकी स्थापना सम्वत् १७३१ में शिवाजी राजे द्वारा होती हैं और वह प्रण करती हैं कि मैं एक ऐसे पुत्र को जन्म दूँगी जो इन विधर्मी शासकों के अत्याचारों को समाप्त कर हमारी इस धरती पर स्वराज्य की स्थापना करेगा।
परन्तु विवाहोपरांत भी जीजा का जीवन कोई कम दुष्कर नही रहा, इस दुसाध्य परिस्थितियों में भी उसे अपने कर्तव्य का भान था। शाहजी दिन-रात युद्ध में व्यस्त रहते थे परन्तु जीजा बाई ने इस मातृभू को यवनों की दासता से मुक्ति की अभिलाषा त्यागी नही थी। स्वराज्य निर्मिति हेतु प्रतिदिन पति से चर्चा, वाद-विवाद तक पहुँच जाती थी।
क्या हम कभी उस स्थिति का आकलन कर सकते हैं एक युगल में स्वराज्य के ध्येय के प्रति समर्पण की वह पराकाष्ठा कि उसके लिए परिवार का वियोग भी हँसते-हँसते स्वीकर लेते हैं।
राष्ट्र के ध्येय के प्रति इतनी निष्ठा कि एक बार जब जीजाबाई के हाथ का बना आम का अचार खाते हुए शाहजी राजे कहते हैं कि “वाह जीजे! आपके इस अचार के आगे तो हम सब भूल गए!” तब वह स्वराजयकांक्षिणी मातोश्री तुरन्त चकित हो कहती हैं कि “क्या! स्वराज्य भी…”
मानो उस नारी में सीता द्रौपदी सावित्री सभी का अंश समाया हो! आदिलशाह द्वारा गधे के हल से उजाड़े गए पुणे की धरती पर वह सोने के हल से बीजारोपण करती हैं, फसल के साथ उस स्वराज्य का भी…
वह नारी जिसने बचपन से अपने पुत्र राजे को श्री राम की मर्यादा के साथ-साथ श्रीकृष्ण की कूटनीति भी सिखायी! धार्मिक ग्रन्थों के साथ ही शस्त्रों में भी निपुण बनाती हैं। इन्ही जीजा बाई के कारण शिवबा तो वह व्यक्ति थे जिनके जीवन का ध्येय उनके जन्म से भी पहले तय हो चुका था। बचपन से ही उनके मन-मस्तिष्क को स्वराज्य से ओत-प्रोत किया जा चुका था उसी का परिणाम रहता है कि मात्र १६ वर्ष की उम्र में तोरणा का किला स्वराज्य का तोरण बन जाता हैं। जब तक शिवबा बड़े होते हैं तब तक वह उनके लिए, स्वराज्य के लिए, अपना सबकुछ समर्पित करने वाले पंत योद्धा सहयोगी तैयार कर चुकी होती हैं, सभी देशमुखों, गायकवाड़, मोहिते, पालकर सभी मराठाओं को संगठित करने हेतु प्रयासरत रहती हैं।
जीजा बाई में ध्येय के प्रति इतनी निष्ठा कि, जब शिवाजी महाराज के द्वितीय विवाह पर सईबाई प्रश्न पूछती हैं तब जीजा माँ यही उत्तर देती हैं कि “सईबाई! हमारे लिए गृहस्थी भी स्वराज्य का एक माध्यम ही हैं।”
जब आदिलशाह स्वराज्य की क्रांति अस्त करने हेतु छल से शाहजी राजे को बन्दी बना लेता हैं, यह स्थिति देख शिवाजी भी एक पल के लिए ठहर जाते हैं तब वह जीजा बाई ही रहती हैं जो उनमें उत्साह का संचार करती हैं और सावित्री के समान उस काल की कोख से भी अपने पति को निकाल लाती हैं। वह बिना संकोच के कहती है कि पति की स्वतंत्रता से भी बढ़कर हैं स्वराज्य की अस्मिता और मुगल सुल्तान शाहजहाँ को पत्र द्वारा अपने सुहाग की रक्षा करती हैं। महाकवि परमानन्द अपने ग्रन्थ “शिवभारत” में माँ जीजा को समस्त पतिव्रता स्त्रियों के लिए आदर्श बताते है।
पुणे की जागीर में बारह मावलों को संगठित करने से प्रारंभ हुआ वह ईश्वरीय कार्य राजगढ़ में पण्डित गागाभट्ट द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज के राजतिलक पर स्वराज्य का सिंहनाद करता हैं। जीजामाता अनिमिष नेत्रों से सब कुछ देखती है, राजदण्डधारी प्रियतम मातोश्री शिवबा को निहारती रही… अब उनका वह पुत्र शिवबा हिन्दवी साम्राज्य संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज हो चुके थे। उनकी आँखों से आनंदाश्रु और दुःखाश्रु दोनों एक साथ बहते रहे, बचपन के स्वराज्य के ध्येय प्राप्ति के आनंदाश्रु और हुतात्माओं के स्मरण से दुःखाश्रु
और इस प्रकार माँ जीजा बाई ने अपने पुत्र शिवाजी द्वारा अपना स्वराज्य का वह स्वप्न साकार किया। मानों वह पुण्यात्मा इसी दिन के लिए ही जी रही थी, हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना के १२वें दिन ही ज्येष्ठ कृष्ण नवमी (जिसे हिन्दी में आषाढ़ कृष्ण नवमी कहते हैं) को अपने प्राण छोड़ देती हैं।
समय चाहें तब का हो या आज का… यदि हमें स्वराज्य के लिए मर-मिटने वाले योद्धा तैयार करने हैं, शिवाजी जैसा स्वराज्यसंस्थापक चाहिए तो निःसन्देह हमें घर-घर में माँ जीजा तैयार करनी होगी, शिवबा तो स्वतः ही उनकी कोख से जन्म लेलेगा।

✍🏽चैतन्य गुँजाल

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments